Cubicles S3 Review: This story of the corporate world will take you from doubt to confidence, overall the series will entertain you well.

फिल्म ‘तारे जमीन पर’ का गाना ‘मंजिल का इशारा जमे रहो’ तो हम सभी ने सुना है। समय बदलता रहता है. पीढ़ियां बदलती रहती हैं. ख़ैर, संघर्ष तो वही है. चाहे वह सड़क पर चलते मजदूर की रोजी-रोटी की लड़ाई हो या ऊंचे-ऊंचे भवनों के वातानुकूलित दफ्तरों में टिप-टॉप कपड़ों में काम करने वाले कॉरपोरेट मजदूरों की। सिनेमा और समाज का रिश्ता कायम रहेगा तो सिनेमा के साथ-साथ समाज की भी प्रगति होगी। टीवीएफ की कहानियों की खासियत यह है कि इसके कहानीकार गहराई में उतरकर दुर्लभ मोती निकाल लाते हैं। कॉरपोरेट जगत के उतार-चढ़ाव पर टीवीएफ की सीरीज ‘क्यूबिकल्स’ नए साल की पहली ठंडी बयार है, जिसका लुत्फ आप इस वीकेंड एक बार बिंज वॉच के तौर पर ले सकते हैं। सभी को नए साल के पहले अच्छे मनोरंजन की शुभकामनाएँ!

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क्यूबिकल्स यानी नए ज़माने के दफ्तरों में काम करने वाले लोगों के लिए बनाई गई छोटी-छोटी एवियरी जैसी जगहें। इन शेडों में काम करने वाले लोगों की ये कहानी पहले ही दो सीज़न में अपना रंग बिखेर चुकी है। पीयूष अभी भी खुद को कॉर्पोरेट जगत में फिट करने और एक कर्मचारी के रूप में आने वाली कठिनाइयों से निपटने की कोशिश कर रहे हैं। इस सीज़न में पीयूष प्रजापति के अपने साथियों के साथ संघर्ष को दर्शाया गया है। प्रेरक पुस्तकों और पॉडकास्ट से प्रेरणा लेकर एक सफल टीम लीडर बनने के ये प्रयास दर्शकों में सकारात्मकता पैदा करते हैं। यह एक ऐसी दुनिया की कहानी है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग ऐसी दुनिया में जाना चाहते हैं। पीयूष की समस्याएं हर संघर्षरत व्यक्ति की समस्याएं हैं और यही सबसे बड़ी वजह है जो दर्शकों को इस सीरीज से जोड़े रखती है।

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पीयूष के कॉरपोरेट संघर्ष की इस कहानी में निर्देशक दिव्यांशु मल्होत्रा ने सीरीज के लेखकों के साथ मिलकर कहानी को इस तरह बुना है कि ऐसा लगता है जैसे सभी किरदार एक जैसे हैं. हर सीन में किसी न किसी लेखक का दिलचस्प जिक्र है. 21वीं सदी में खुद को बदलकर खुद को बेहतर साबित करने की जद्दोजहद और सफलता पाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद हर तरीके को आजमाने के साथ-साथ भावनाओं को जगाता है। निर्देशन और लेखन टीम की जीत इस बात में भी है कि यह सीरीज ढेर सारा ज्ञान देने के बजाय जो कुछ भी कहना चाहती है, उसके दृश्यों को बेहद स्वाभाविक तरीके से बुनती रहती है।

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‘क्यूबिकल्स सीज़न 3’ में पीयूष का किरदार निभाने वाले अभिनेता अभिषेक चौहान की अभिनय क्षमता का आलम यह है कि वह पहले एपिसोड से ही दर्शकों को इस किरदार की समस्याओं से सीधे जोड़ देते हैं। एक समस्या सुलझती है और दस नई समस्याएँ सामने खुली आँखों से खड़ी मिल जाती हैं। मन में चल रहा संवाद कॉरपोरेट सेटअप में पनपने वाले मानसिक तनाव को साफ दिखाता है। गौतम बत्रा के रोल में एक्टर बद्री चव्हाण का काम भी असरदार है। तनावपूर्ण स्थिति में ये एक ऐसा किरदार है जिसे देखकर और सुनकर थोड़ी देर के लिए ही सही लेकिन मुस्कुराहट आ ही जाती है। सुनैना चौहान की भूमिका में आयुषी गुप्ता पूरी तरह से एक कॉर्पोरेट महिला की तरह दिखती हैं। निकेतन शर्मा ने नवीन शेट्टी का किरदार बखूबी निभाया है। केतकी कुलकर्णी, शिवांकित परिहार और खुशबू बैद के दृश्य गुदगुदाते हैं।

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वेब सीरीज ‘क्यूबिकल्स सीजन 3’ में इसके गानों ने कहानी को और भी इमोशनल रूप दिया है। कार्तिक राव, वरुण जैन और अंकुर ज्योति, भार्गव कटेलिया और अरबिंद नेग की गायकी में एक आकर्षण है, जिसे अंकुर ज्योति, अरबिंद नेग, अनुराग सैकिया और कार्तिक राव ने स्वर लहरियों में बांध कर दर्शकों के सामने दिलचस्प तरीके से पेश किया है। सीरीज की सिनेमैटोग्राफी, एडिटिंग, म्यूजिक, बैकग्राउंड म्यूजिक सब अपनी जगह तैयार है।


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